रमाशंकर सिंह का आलेख ‘उत्तर प्रदेश के घुमन्तू समुदायों की भाषा और उसकी विश्व-दृष्टि’

रमाशंकर सिंह घुमन्तू जातियाँ जो आमतौर पर मानव के प्रचेनतम रूप को अभिव्यक्त करती हैं, मनुष्यता की धरोहर हैं। इनकी अपनी एक पुष्ट संस्कृति और भाषा होती है। आधुनिकता की मार से ये जातियां सर्वाधिक प्रभावित हुईं हैं। और प्रभावित हुई है इनकी संस्कृति और भाषा भी। तुर्रा यह कि दुनिया की तथाकथित सभ्य जातियों […]

अनुपम मिश्र की (ब्रज रतन जोशी की किताब ‘जल और समाज’ पर) भूमिका

अनुपम मिश्र अभी हाल ही में युवा रचनाकार ब्रज रतन जोशी की एक महत्वपूर्ण किताब प्रकाशित हुई है। ‘जल और समाज’ नाम से छपी इस महत्वपूर्ण पुस्तक की भूमिका लिखी है अनुपम मिश्र जी ने। दुर्भाग्यवश अनुपम जी अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन जल– संरक्षण के लिए उन्होंने जो काम किया है उससे वे […]

श्रद्धा मिश्रा की कविताएँ

श्रद्धा मिश्रा प्यार जीवन की गहनतम अनुभूति होती है। दुनिया में ऐसा कोई रचनाकार नहीं होगा जिसने प्रेम को आधार बना कर कविताएँ न लिखीं हो। अक्सर नए रचनाकार अपने लेखन की शुरुआत ही प्रेम-कविताओं से ही करते हैं। प्रेम जो एक विद्रोह होता है अपने समय और समाज से। प्रेम जो अपने मन-मस्तिष्क के […]

प्रियदर्शन का आलेख ‘और अंत में उदय प्रकाश’.

उदय प्रकाश उदय प्रकाश हमारे समय के चर्चित कवि-कथाकार हैं. वे अपनी हर रचना के साथ कुछ नया प्रयोग करने की कोशिश करते हैं. व्यक्तित्व को ले कर कई एक कहानियों का जो ताना-बाना उन्होंने बुना है उसमें बकौल उनके वे खुद भी गहराई से शामिल होते हैं. और रचना भी तो वही कालजयी होती […]

राजेश उत्‍साही का आलेख – बाल साहित्य : चुनौतियाँ और संभावनाएँ :

राजेश उत्‍साही हमारे यहाँ बच्चों की शिक्षा के मायने सिर्फ यही है कि वह स्कूल जाए। पाठ्यक्रम की किताबें पढ़े। होम-वर्क करे। और अच्छे नम्बरों से परीक्षा पास करे। इस बंधी-बधाई दुनिया में थोड़ा मोड़ा टेलीविजन के कार्यक्रम, थोड़ा फेसबुक और व्हाट्स-अप भी अपनी जगह बना लेते हैं। लेकिन इस दुनिया में बाल-साहित्य के लिए […]

अच्युतानंद मिश्र का आलेख ‘शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है’

मुक्तिबोध आजाद भारत, जिसके सपने बुनते हमारे तमाम सेनानी अपनी आहुति दे बैठे, उनके लिए एक यूटोपिया ही साबित हुआ जिन्होंने उससे तमाम उम्मीदें पाल रखीं थीं.  शासकों के रंग-रूप तो जरुर बदल गए, लेकिन उनका चरित्र नहीं बदला. कुल मिला कर वह लोकतंत्र ही लहुलुहान होता रहा जिसे आजाद भारत का आधार बनाया गया […]

दारियो फ़ो की मृत्यु पर उनके कलाकार लेखक पुत्र जकोपो फ़ो का वक्तव्य (अनुवाद : यादवेन्द्र)

दारियो फ़ो 1997 के साहित्य नोबेल पुरस्कार विजेता महान इतालवी नाटककार और वामपंथी सांस्कृतिक ऐक्टिविस्ट दारियो फ़ो का इटली के मिलान में 13 अक्टूबर 2016 को निधन हो गया। जीवन की विसंगतियों पर वे जिस तरह से व्यंग्य करते थे वह अपने आप में बेजोड़ होता था। दारियो फ़ो ने चालीस से ज्यादा नाटक लिखे […]

तुषार धवल की कविताएँ

तुषार धवल जिन्दगी के चलने का ढर्रा बेतरतीब होता है। अपनी बेतरतीबी में ही यह वह तरतीब रचती है जिसे कवि, चित्रकार और समाज विज्ञानी अपनी-अपनी तरह से उकेरने का प्रयास आजीवन करते रहते हैं। एक अर्थ में कलाकार जो ललित रचनाओं से जुड़े होते हैं समाज के सजग पहरेदार होते हैं। अपनी रचनाओं के द्वारा […]

मुक्तिबोध के संबंध में विनोद कुमार शुक्ल से घनश्याम त्रिपाठी और अंजन कुमार की बातचीत

मुक्तिबोध मुक्तिबोध जन्म-शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं द्वारा मुक्तिबोध विशेषांक निकाले जा रहे हैं। यह स्वाभाविक होने के साथ-साथ हम सब का दायित्व भी है। इलाहाबाद से प्रकाशित होने  वाली पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ का अभी-अभी मुक्तिबोध अंक आया है। इस अंक में मुक्तिबोध के नजदीक रहे कवि विनोद कुमार शुक्ल से साक्षात्कार लिया […]

भारत भूषण जोशी की कहानी ‘गौरदा’

भारत भूषण जोशी संस्कृति मनुष्य को जोड़ने में एक बड़ी भूमिका अदा करती आयी है। हमारे यहाँ धर्म भी इस संस्कृति का अटूट हिस्सा रहा है। यह अटूट पना कुछ इस प्रकार का है कि एक दूसरे को अलगा कर इन्हें जाना और समझा ही नहीं जा सकता। धर्म जिसके अंतर्गत तीज, त्यौहार, परम्पराएँ एक […]