वसुधा डालमिया का आलेख ‘औपनिवेशिक भारत में परम्परा का संघटन : हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान; अनुवाद -संजीव कुमार

वसुधा डालमिया आज अलग अर्थों में ‘राष्ट्रवाद’ और ‘हिन्दू’ शब्द बड़ी चर्चा में है। इस पहचान को एक कट्टरवादी तबका इन दिनों अपनी संकीर्णता में व्याख्यायित करने की कोशिशें कर रहा है। यह जाने बगैर कि राष्ट्रवाद की अवधारणा बिलकुल आधुनिक यूरोपीय अवधारणा है। और हिन्दू शब्द भी उन अर्थों में प्रयुक्त तो नहीं ही […]

संजीव कुमार का आलेख ‘निबंधात्मक कहानियां या कथात्मक निबंध?’

मुक्तिबोध  मुक्तिबोध का जन्म-शताब्दी वर्ष शुरू होने वाला है। उनके कृतिकार रूप को विश्लेषित करने के प्रयास आरम्भ हो चुके हैं। मुक्तिबोध ने अपनी रचनाओं में हमेशा उन वंचितों की बात करने की कोशिश की है जिनकी बातें प्रायः अनसुनी रह जाती हैं। ऐसे वंचित जिनकी कथाएं प्रायः अस्त-व्यस्त या अधूरी ही दिखाई पड़ती हैं। […]

जलेस की बांदा कार्यशाला

विगत 2 क्टूबर से 4 अक्टूबर 2015 के बीच उत्तर प्रदेश के बाँदा के एक गाँव बडोखर खुर्द में ‘अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद की साझा जमीन पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गयी. तीन दिनों की इस कार्यशाला में विशेषज्ञों ने अपने महत्वपूर्ण विचार रखे और प्रतिभागियों ने उन विचारों पर गर्मागर्म बहसें कीं. इस कार्यशाला […]

मालचंद तिवाड़ी की ‘बोरून्दा डायरी’ पर संजीव कुमार की समीक्षा

विजयदान देथा  कानपुर से निकलने वाली पत्रिका ‘अकार’ का अभी-अभी एक महत्वपूर्ण अंक आया है. यह अंक इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें वर्ष की उम्दा पुस्तकों की समीक्षा महत्वपूर्ण रचनाकारों द्वारा की गयी है. इस अंक के अतिथि सम्पादक युवा कहानीकार एवं आलोचक राकेश बिहारी हैं. इस अंक में मालचंद तिवाड़ी की ‘बोरुन्दा […]

संजीव कुमार का आलेख ‘स्वामी ने क्या ग़लत कहा’

हिटलर का अत्यन्त विश्वस्त गोयबल्स यह कहा करता था कि अगर एक झूठ को सौ बार बोला जाय तो वह सच लगने लगता है। आज इतिहास एक बार फिर अपने को दुहरा रहा है। हमारे समय के गोयबल्स हैं श्री दीना नाथ बत्रा। तमाम किताबें लिख मारने वाले बत्रा जी की किताब के हकीकत और […]

संजीव कुमार

वरिष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी के जन्‍मदिन (10 सितम्‍बर) पर उनके रचनाकर्म पर युवा आलोचक संजीव कुमार का आलेख- संजीव कुमार शेखर जोशी : दबे पाँव चलती कहानियाँ बीती सदी का छठा दशक हिन्‍दी कहानी के अत्यंत ऊर्वर दौर के रूप में आज भी याद किया जाता है। अगर हिन्‍दी के दो दर्जन प्रतिनिधि कहानीकारों की […]