वैभव सिंह का आलेख ‘अंधेरे मेः आत्मसंघर्ष के निहितार्थ’

मुक्तिबोध हिन्दी की कालजयी कविताओं की जब भी बात की जायेगी ‘अँधेरे में’ कविता की चर्चा जरुर की जाएगी। इस कविता का वितान महाकाव्यात्मक है। काफी लम्बी कविता होने के बावजूद जब हम इसमें प्रवेश करते हैं तो प्रायः वही स्थितियां पाते हैं, मुक्तिबोध जिसके भुक्तभोगी थे। हमारे यहाँ आज भी वही दुरभि-संधियाँ होती हैं। […]

वैभव सिंह का आलेख ‘आस्था के अंधकार’

हम भारत के लोग खुद के उदारवादी होने का दावा करते नहीं थकते। लेकिन स्वयं कई तरह की कट्टरताओं और पूर्वाग्रहों से इस कदर आक्रान्त होते हैं कि दूसरों की नजर में हमारा चेहरा विकृत दिखायी पड़ने लगता है। इस से बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि अहिंसा के अस्त्र से देश के […]

वैभव सिंह का आलेख ‘गढ़ाकोला में दिखे उदास निराला’

सूर्यकान्त त्रिपाठी आज वसंत पंचमी है। वसंत पंचमी का दिन महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म दिन भी है। हाल ही में युवा आलोचक वैभव सिंह उनके पैतृक गांव उन्नाव के गढ़ाकोला गए थे। गढ़ाकोला से लौट कर वहाँ की दशा-दुर्दशा पर युवा आलोचक वैभव ने एक आलेख लिखा है। वसंतपंचमी की बधाई देते हुए […]