कैलाश बनवासी के उपन्यास ‘लौटना नहीं है’ पर विनोद तिवारी की समीक्षा ‘समाज का बंद घेरा बहुत मजबूत होता है’

कैलाश बनवासी कैलाश बनवासी का एक महत्वपूर्ण उपन्यास आया है ‘लौटना नहीं है। यह उपन्यास इस मायने में अहम् है कि आज के निम्नमध्यम वर्गीय स्त्री जीवन की पड़ताल करने के साथ-साथ इन स्त्रियों में अपने जीवन के प्रति आयी चेतना को भी बखूबी सामने रखा है। जिस पल उपन्यास की नायिका गौरी यह निश्चय […]

विनोद तिवारी का आलेख ‘आलोचना का समाज क्या है? कहाँ है?’

अशोक वाजपेयी अशोक वाजपेयी कवि होने के साथ-साथ एक आलोचक भी हैं. युवा आलोचक विनोद तिवारी ने अपने आलेख ‘आलोचना का समाज क्या है? कहाँ है?’ में अशोक जी के आलोचक व्यक्तित्व की पड़ताल करने की कोशिश की है. तो आइए पढ़ते हैं विनोद तिवारी का यह आलेख.     आलोचना का समाज क्या है […]