विजेंद्र की कविता पर हुई एक गोष्ठी की रपट

हाल ही में “कवि  विजेंद्र की  कविता और  आज  के समय में  कविता की जरुरत ” विषय  पर  लखनऊ  में  एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी की एक रपट हमें भेजी है अशोक चन्द्र ने। प्रस्तुति आशीष सिंह की है। तो आइए पढ़ते हैं इस गोष्ठी  की यह रपट” विजेन्द्र  की  सतत  अग्रगामी […]

विजेन्द्र जी की किताब ‘आधी रात के रंग’ पर रश्मि भारद्वाज की समीक्षा

विजेन्द्र जी पाब्लो पिकासो ने कभी कहा था कि ‘कुछ पेंटर सूरज को एक पीले धब्बे में बदल देते हैं जबकि अन्य पेंटर एक पीले धब्बे को सूरज में।’ यानी कला जितनी आसान दिखती है वह अपने में उतनी ही मुश्किल होती है। लेकिन कवि जो वस्तुतः एक कलाकार ही होता है इस मर्म को […]

विजेंद्र के संग्रह “आधी रात के रंग” पर शाहनाज़ इमरानी की समीक्षा

कवि  या कलाकार होने की पहली ही शर्त है  अपनी जमीन और अपने लोक से जुड़ाव। विजेन्द्र जी ऐसे कवि हैं जो आज भी अपने जमीन और लोक से पूरी तरह जुड़े हुए हैं। उनकी कविता हो या उनके चित्र इस बात की स्पष्ट रूप से ताकीद करते हैं। ‘आधी रात के रंग’ उनकी एक […]

‘प्लाजमा’ कविता पर अमीरचंद वैश्य का आलेख

   विजेन्द्र जी की लोक के प्रति प्रतिबद्धता से हम सब वाकिफ हैं. इसी क्रम में उन्होंने कई लम्बी कविताएँ भी लिखी हैं जिनमें प्लाजमा उल्लेखनीय है. इस लम्बी कविता की पड़ताल की है अमीर चन्द्र वैश्य ने. तो आईये पढ़ते हैं अमीर जी का यह आलेख ‘समर जारी है बदस्तूर’   समर जारी है […]

विजेन्द्र जी की किताब ‘सौंदर्यशास्त्र : भारतीय चित्त और कविता’ पर सुशील कुमार की समीक्षा

·           किसी भी कवि को गद्य जरुर लिखना चाहिए. उसकी पहचान उसके गद्य से की जा सकती है. कवि का गद्य अन्ततः उसके कवि-कर्म को ही और निखारता है. विजेन्द्र जी हमारे समय के ऐसे महत्वपूर्ण कवि हैं जिन्होंने प्रचुर मात्रा में गद्य लेखन के साथ-साथ अद्भुत पेंटिंग्स भी बनाये हैं. कविता में सौन्दर्य […]

‘कृति ओर’ (65-66) के ‘पूर्वकथन’ पर आशीष कुमार सिंह की टिप्पणी

विजेन्द्र जी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे ‘कृति ओर’ पत्रिका में अपने पूर्वकथन के लिए भी जाने जाते हैं। इसमें वे अपने बेबाक विचार तत्कालीन समाज राजनीति और साहित्य के मद्देनजर रखते हैं। ‘कृति ओर’ का अधिकांश पाठक वर्ग इसकी प्रतीक्षा ‘पूर्व कथन’ के लिए करता है। इसी ‘पूर्व कथन’ पर हमारे युवा साथी आशीष […]

विजेन्द्र की कविता ‘ओ एशिया’ पर अमीर चन्द वैश्य का आलेख

यह विडम्बना ही है कि दुनिया का सबसे बड़ा महाद्वीप होने के बावजूद एशिया एक लम्बे समय से साम्राज्यवादी शक्तियों के उत्पीड़न का शिकार रहा है। पहले यूरोपीय शक्तियों ने एशिया के देशों को गुलाम बना कर शोषण किया और अब अमरीका अपने निहित स्वार्थों के चलते एशिया के ही विभिन्न हिस्सों कभी ईराक, कभी […]

विजेन्द्र जी के संग्रह ‘आँच में तपा कुंदन’ पर जीतेन्द्र जी की समीक्षा

वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी दस जनवरी को अपनी उम्र का अट्ठाहत्तरवाँ पड़ाव पूरा कर रहे हैं। इस उम्र में भी जिस प्रतिबद्ध ढंग से वे लेखन कार्य में जुटे हैं वह हमें अचंभित करता है। उनका अध्ययन क्षेत्र व्यापक है। विश्व साहित्य पर उनकी पकड़ तो है ही वे बिल्कुल नए से नए रचनाकारों की […]

विश्व लोकधर्मी कवियों की श्रृंखला-3: माइकोव्स्की

                                                                    (मायकोव्स्की) पहली बार पर हमने जनवरी में ‘विश्व के लोकधर्मी कवियों की एक श्रृंखला’ का आरम्भ किया था। वरिष्ठ कवि एवं आलोचक विजेन्द्र जी ने हमारे आग्रह पर इस श्रृंखला पर लिखने की अपनी सहमति दी थी। इस कड़ी में आप पहले ही व्हिटमैन और बाई जुई के बारे में पढ़ चुके हैं। तीसरी […]