वन्दना शुक्ला का संस्मरण ‘आँखों में ठहरा हुआ वो मंज़र’

इतिहास की कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जिनका नाम आते ही हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसी ही एक तारीख़ थी – 2 दिसम्बर 1984.  यह तारीख़ न केवल भोपाल बल्कि पूरे देश के लिए एक गहरे जख्म की तरह है जो रह-रह कर आज भी रिसता रहता है। यूनियन कारबाईड कंपनी से रिसी […]

वन्दना शुक्ला की कहानी ‘माँ’

वन्दना शुक्ला इंसानी रिश्ते भी अजीब होते हैं। वे कब कहाँ किस के साथ जुड़ जाएँ कहा नहीं जा सकता। ‘माँ’ इन रिश्तों की पड़ताल करती एक बेजोड़ कहानी है। एक माँ जो अपने से बिछड़ गए बेटे को खोजने के लिए बावली रहती है और तरह-तरह के जतन करती है। आखिर कार उसे तेरह […]

वन्दना शुक्ला का यात्रा वृत्तांत

लेखक जब भी कहीं किसी जगह की यात्रा करता है तो औरों से इतर वह वहाँ की आबोहवा, परिस्थितियों, जलवायु, ऐतिहासिक इमारतों, दस्तावेजों, उस जगह की ऐतिहासिकता आदि को अपने लेखन का हिस्सा बनाता है। स्वयं द्रष्टा होते हुए भी उससे अलग हो कर उसे देखने का प्रयास करता है और उसे लिपिबद्ध करने की […]

वन्दना शुक्ला के उपन्यास ‘मगहर की सुबह’ का एक अंश

वन्दना शुक्ला ने थोड़े ही समय में कहानीकार के रूप में अपनी पहचान बना ली है। जीवन की उष्मा से भरी हुई उनकी कहानियाँ सहज ही हमारा ध्यान आकृष्ट करती रही हैं। आधार प्रकाशन से वन्दना का पहला उपन्यास ‘मगहर की सुबह’ आने वाला है। इस उपन्यास में भी ग्रामीण और कस्बाई जीवन के रंग […]

वन्दना शुक्ल के कहानी संग्रह ‘उड़ानों के सारांश’ और कैलाश वानखेड़े के संग्रह ‘सत्यापन’ पर भालचन्द्र जोशी की समीक्षा।

  इधर दो युवा कहानीकारों के महत्वपूर्ण कहानी संग्रह आये हैं। पहला संग्रह है वन्दना शुक्ल का ‘उड़ानों के सारांश’ जबकि दूसरा संग्रह है ‘सत्यापन’ जिसके कहानीकार हैं कैलाश वानखेड़े। यह संयोग मात्र नहीं कि ये दोनों कहानीकार हमारे समाज के उन वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सदियों से  दमन और उत्पीडन का सामना […]

वन्दना शुक्ला

हमारे समय के कहानीकारों में वन्दना शुक्ला अब एक सुपरिचित नाम है। इधर की पत्र-पत्रिकाओं में वन्दना ने अपनी कहानियों के जरिये अपनी एक सुस्पष्ट पहचान बना ली है। आज पहली बार पर प्रस्तुत है वन्दना शुक्ला का की लम्बी कहानी ‘किस्सों में कोलाज’ का एक अंश।   चौथा किस्सा   मै चला जा रहा था एक […]