महेश चंद्र पुनेठा का आलेख ‘शिक्षा और मनोविज्ञान की भी गहरी समझ रखते थे मुक्तिबोध’

मुक्तिबोध अपने एक वक्तव्य के दौरान एक दफे नामवर सिंह ने कहा था – ‘जो युग जितना ही आत्म-सजग होता है उसके मूल्यांकन का काम उतना ही कठिन हो जाता है।’ इस वक्तव्य में युग की जगह अगर रचनाकार कर दिया जाए तो मुक्तिबोध के मूल्यांकन के संदर्भ में यह एक सर्वथा उपयुक्त वक्तव्य होगा। […]

अच्युतानंद मिश्र का आलेख ‘शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है’

मुक्तिबोध आजाद भारत, जिसके सपने बुनते हमारे तमाम सेनानी अपनी आहुति दे बैठे, उनके लिए एक यूटोपिया ही साबित हुआ जिन्होंने उससे तमाम उम्मीदें पाल रखीं थीं.  शासकों के रंग-रूप तो जरुर बदल गए, लेकिन उनका चरित्र नहीं बदला. कुल मिला कर वह लोकतंत्र ही लहुलुहान होता रहा जिसे आजाद भारत का आधार बनाया गया […]

मुक्तिबोध के संबंध में विनोद कुमार शुक्ल से घनश्याम त्रिपाठी और अंजन कुमार की बातचीत

मुक्तिबोध मुक्तिबोध जन्म-शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं द्वारा मुक्तिबोध विशेषांक निकाले जा रहे हैं। यह स्वाभाविक होने के साथ-साथ हम सब का दायित्व भी है। इलाहाबाद से प्रकाशित होने  वाली पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ का अभी-अभी मुक्तिबोध अंक आया है। इस अंक में मुक्तिबोध के नजदीक रहे कवि विनोद कुमार शुक्ल से साक्षात्कार लिया […]

अनिल कुमार सिंह का आलेख ‘जीवन-संघर्ष का यथार्थ: मुक्तिबोध की कविता’

मुक्तिबोध मध्यवर्गीय विडम्बनाओं को देखने-पहचानने के लिए आपको जरुरी तौर पर मुक्तिबोध के पास जाना पड़ेगा। उनके लेखन के गहन आशय हैं। जीवन की तल्ख़ अनुभूतियाँ हैं। यह वर्ष मुक्तिबोध का जन्म-शताब्दी वर्ष है। हमारी कोशिश है कि इस महाकवि को याद करते हुए हर माह कम से कम एक आलेख ‘पहली बार’ पर प्रस्तुत […]

वैभव सिंह का आलेख ‘अंधेरे मेः आत्मसंघर्ष के निहितार्थ’

मुक्तिबोध हिन्दी की कालजयी कविताओं की जब भी बात की जायेगी ‘अँधेरे में’ कविता की चर्चा जरुर की जाएगी। इस कविता का वितान महाकाव्यात्मक है। काफी लम्बी कविता होने के बावजूद जब हम इसमें प्रवेश करते हैं तो प्रायः वही स्थितियां पाते हैं, मुक्तिबोध जिसके भुक्तभोगी थे। हमारे यहाँ आज भी वही दुरभि-संधियाँ होती हैं। […]

आशुतोष कुमार का आलेख ‘मुक्तिबोध की कविताएँ: ‘कि बेबीलोन सचमुच नष्ट होगा क्या?’

युवा आलोचक आशुतोष कुमार का एक महत्वपूर्ण आलेख आलोचना के मुक्तिबोध अंक में प्रकाशित हुआ है. यह आलेख मुक्तिबोध के रचना-कर्म को जानने-समझने के लिए एक जरुरी आलेख है. आशुतोष कुमार उन कुछ विरल आलोचकों में से हैं जो अत्यन्त कम लिखते हैं. फेसबुक पर सक्रियता के साथ-साथ प्राध्यापन कर्म और अन्य सामाजिक सक्रियताओं के […]

संजीव कुमार का आलेख ‘निबंधात्मक कहानियां या कथात्मक निबंध?’

मुक्तिबोध  मुक्तिबोध का जन्म-शताब्दी वर्ष शुरू होने वाला है। उनके कृतिकार रूप को विश्लेषित करने के प्रयास आरम्भ हो चुके हैं। मुक्तिबोध ने अपनी रचनाओं में हमेशा उन वंचितों की बात करने की कोशिश की है जिनकी बातें प्रायः अनसुनी रह जाती हैं। ऐसे वंचित जिनकी कथाएं प्रायः अस्त-व्यस्त या अधूरी ही दिखाई पड़ती हैं। […]

जीवन सिंह का आलेख ‘मुक्तिबोध-पूंजी बाज़ार का समय और मुक्तिबोध की कविता

मुक्तिबोध स्वतन्त्रता के बाद के भारतीय काव्य परिदृश्य को जिन दो कवियों ने अधिकाधिक प्रभावित किया है उनमें निराला के साथ-साथ मुक्तिबोध का नाम भी बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है।   मुक्तिबोध (13 नवम्बर 1917 से 11 सितम्बर 1964) ने प्रगतिशीलता के साथ-साथ नयी कविता को वह स्वरुप प्रदान किया जो […]