बुद्धिलाल पाल

पुनरूत्थान में पुनर्विकास की निरंतरता नहीं होती (संदर्भ – विनोद शाही का लेख)       ‘‘लौ‘‘ अंक 2 में विनोद शाही का आलेख ‘‘पुनरूत्थान और पुनर्विकास‘‘ तथा जीवन सिंह का आलेख ‘‘कविता में लोकधर्मी प्रतिमान‘‘ यह दोनो लेख जीवन की समग्र भाव भंगिमाओं में जीवन को बहुत विस्तार देते हैं। पर यहाँ पर मैं विनोद शाही […]