बलभद्र की किताब पर सुमन कुमार सिंह की समीक्षा ‘कब कहलीं हम : समय पर समय का सच’

                   कवि एवं आलोचक बलभद्र का भोजपुरी में एक नया कविता संग्रह आया है ‘कब कहलीं हम’। हिन्दी में लिखने के बावजूद बलभद्र को ऊर्जा उनकी अपनी बोली-बानी भोजपुरी से मिलती है। बलभद्र मूलतः गंवई संवेदना या और स्पष्ट कहें तो किसान संवेदना के कवि हैं। गंवई संवेदना जिसमें सहकारिता है। जहाँ पर मन में सबके […]

जितेन्द्र कुमार के काव्य-संग्रह ‘समय का चन्द्रमा’ के बारे में

जितेन्द्र कुमार का काव्य-संग्रह ‘समय का चन्द्रमा’ वर्ष 2009 में ही प्रकाशित हुआ था। लेकिन इस  महत्वपूर्ण संग्रह पर कोई बातचीत नहीं हो पायी थी।इस संग्रह  पर एक समीक्षा लिखी है हमारे कवि-आलोचक मित्र बलभद्र ने। तो आईए पढ़ते हैं यह समीक्षा।   बलभद्र     जितेन्द्र कुमार का काव्य-संग्रह ‘समय का चन्द्रमा’ वर्ष 2009 में ही प्रकाशित […]

बलभद्र

‘ग्लोबल गाँव के देवता’ रणेन्द्र का चर्चित उपन्यास है। कवि-आलोचक बलभद्र ने इन दिनों अपने अध्ययन के क्रम में इस उपन्यास को पढ़ते हुए इस पर स्वतःस्फूर्त ढंग से अपनी पाठकीय प्रतिक्रिया लिख डाली है। तो आईये पढ़ते हैं बलभद्र की इस प्रतिक्रिया को जो एक अलग नजरिये से इस उपन्यास की पड़ताल है।     […]

जो जनता के लिए लिखेगा, वही इतिहास में बना रहेगा

 (चित्र: मधुकर सिंह को जन संस्कृति मंच की तरफ से सम्मानित करते प्रणय कृष्ण) 22 सितंबर 2013 को बिहार के आरा में वरिष्ठ कहानीकार मधुकर सिंह को सम्मानित करने का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस पूरे आयोजन की एक रपट भेजी है हमारे मित्र कवि बलभद्र ने। जिसे लिखा है सुधीर सुमन ने   प्रस्तुत है […]

बलभद्र

मार्कण्डेय जी की पुण्यतिथि पर आयोजित विशेष प्रस्तुति के अंतर्गत आज पेश है युवा कवि एवं आलोचक बलभद्र का यह संस्मरण। ध्यातव्य है कि बलभद्र का शोध कार्य मार्कंडेय की रचनाधर्मिता पर ही है। इसी क्रम में बलभद्र मार्कण्डेय के बहुत नजदीक आये. स्वयं मार्कण्डेय जी का मानना था कि उन पर किये गए सारे […]

बलभद्र

अंटका  में पड़ल वसंत गाँव के गाँव  सरसों  के पियर-पियर फूलन से घेरा गईल बा. हरियर हरियर के  ऊपर -ऊपर पियर-पियर. एह दूनो  रंग के ई आपसी   संजोग दूसर कौनो मौसम में  ना मिली. ई हरियर आ पियर   ऊपर से नइखे टपकल, बलुक धरती के भीतर  से  निकलल बा. अपने आप नाहीं.  कुछे दिन पहिले  त धेला धमानी  रहे . एक रंग माटी के रंग. आ आज अनेक रंग, आ अनेक के ऊपर सरसों के रंगीनी. माटी  में आदमी आपन परान बो के साकार करेला अइसन रंग. कवनो खेत में  गेहूँ, कवनो में  जौव  , कवनो में तीसी, बूंट, मटर, कवनो-कवनो में. आ सब में  सरसों टपका-टपका. कवनो-कवनो में खाली सरसों. तब जा के पसरल बा सगरो  सउसे बधार में अइसन रंगीनी. कवनो  रंगरेज धरती के चुनरी रंग देले बा एह  रंग में. गावन के  घेर- घुरवेट देले […]

बलभद्र

दूसरी किश्त बलभद्र लेवा … … बाकी अब त बतिये कुल्हि बदलत जात रहल बा. पुरान साड़ी आ दू-अढाई सै रुपिया ले के शहर-बाजार में, लेवा त ना, बाकिर लेवे अइसन चीज सिये के कारोबार शुरू बा. बस एह में फोम रहेला पतराह, एकदम बिच में. सीआई, फराई, काट-डिज़ाइन एकदम लेवा अस. अब त नयो-नयो कपड़ा के […]

बलभद्र

लेवा ई कवनो पूंजीपति घराना के उत्पाद ना ह कि एकरा खातिर कवनो सरकारी भा गैरसरकारी योजना भा अभियान चली. ई  गाँव  के गरीब मनई आ हदाहदी बिचिलिका लोग के चीज ह. एकदम आपन. अपना देहे-नेहे तैयार कइल. एकरा खातिर कवनो तरह के अरचार-परचार ना कब्बो भइल बा, ना होई कवनो टी वी भा अखबार में. ई गाँव के मेहरारुन के […]