कवि नरेश सक्सेना पर युवा आलोचक नलिन रंजन सिंह का आलेख ‘सुनो चारुशीला: जैसे कविता को लय मिल गई हो’

  नरेश सक्सेना नरेश सक्सेना हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि हैं। विज्ञान या कह लें कि अभियांत्रिकी से जुड़े होने का प्रभाव उनकी कविता में स्पष्ट परिलक्षित होता है लेकिन यह प्रभाव कोई कृत्रिमता नहीं पैदा करता अपितु प्रकृति के साथ जुडाव को और पुख्ता ही करता है। नरेश सक्सेना के कविता संग्रह ‘सुनो चारुशीला’ […]

नरेश सक्सेना

नरेश सक्सेना उन कुछ विरल कवियों में से एक हैं जिन्होंने कम लिख कर भी बहुत ख्याति पायी है. वे कभी भी हडबडी में नहीं दिखते. लेकिन जब भी लिखते हैं वह चर्चा का विषय बन जाता है. इनकी कविता में कहीं भी एक अतिरिक्त शब्द या पंक्ति नहीं मिलेगी. अपनी बनक में ये कवितायेँ […]

नरेश सक्सेना से उमाकांत की बातचीत

  मुक्तिबोध ने हिंदी कविता की संरचना और विचार  को तोड दिया था महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में 12 मई 2012 को शोधार्थी उमाकांत ने अभी हाल ही में कवि नरेश सक्सेना से एक साक्षात्कार लिया था. यह साक्षात्कार बहुवचन के संयुक्तांक ३३-३४ में प्रकाशित हुआ है. इसे हम पहली बार के पाठकों के […]