चैतन्य नागर का आलेख ‘सन्नाटा है, तनहाई है, कुछ बात करो’

चैतन्य नागर सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य अपने भयावह एकाकीपन की तरफ भी बढ़ा है। ऐसा एकाकीपन जो अवसाद में डाल दे। लोगों से आज हम अक्सर यह सुनते हैं कि हमारे पास सब कुछ है लेकिन समय नहीं। मनुष्य के आगे बढ़ने और सर्वशक्तिमान होने के पीछे जो महत्वपूर्ण कारक रहा है उसमें […]

चैतन्य नागर का लेख ‘मौत के बाद का कारोबार’।

  चैतन्य इस सृष्टि में जहाँ भी जीवन है वहाँ मौत है। प्राचीन काल से ही मनुष्य अपने मृतकों की अंत्येष्टि के लिए तरह-तरह के तौर तरीके अपनाता रहा है। किसी को अपने सम्बन्धी के शव की अंत्येष्टि के लिए ‘दो गज जमीन’ चाहिए तो किसी को ‘पाँच मन लकड़ी।’ हिन्दू परम्परा में तो यह […]

चैतन्य नागर का आलेख ‘…बुरा न मिलिया कोय’

चैतन्य नागर पिछले दिनों सहिष्णुता-असहिष्णुता के सवाल पर काफी बातें-बहसें होतीं रहीं। इस मुद्दे पर सबका अपना-अपना पक्ष था। युवा विचारक चैतन्य नागर ने इस सहिष्णुता-असहिष्णुता के मुद्दे पर एक गंभीर एवं चिंतनपरक आलेख लिखा है। इसके माध्यम से उन्होंने इसे एक नए दृष्टिकोण से  सोचने का प्रयास किया है। तो आइए पढ़ते हैं चैतन्य […]

चैतन्य नागर का आलेख ‘दुःख का डी एन ए’

चैतन्य नागर दुःख मानव जीवन एक ऐसा सत्य है जिस पर समय-समय पर अनेक महान विभूतियों ने चिन्तन-मनन किया है। इस क्रम में बुद्ध का चार आर्य सत्य काफी ख्यात है। इस क्रम में दुःख पर विपुल मात्रा में लेखन किया गया है। चित्र हों या मूर्ति-कला; कहानी हो या कविता सबमें दुःख मानव जीवन […]

चैतन्य नागर की कविताएँ

  चैतन्य की कवितायें हमारे अंदर वह बेचैनी पैदा करतीं हैं जो अब आम तौर पर समाप्त होती जा रही है। बढ़ते भौतिकतावाद के साथ हमारी संवेदनशीलता लगातार क्षरित होती जा रही है। पहले हम समझ जाते थे बकौल कवि  ‘क्यों, किसके लिए रो रही है /किस बीते कल के लिए /किस दुखती रग को’ […]

चैतन्य नागर

  आम तौर पर जहां लोग देश और दुनिया के तमाम राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत संकटों का कारण और समाधान बाहरी तरीकों और माध्यमों में ढूंढते हैं, वहीं चैतन्य इनकी मनौवैज्ञानिक जड़ों और उपचारों की पड़ताल में लगे रहते हैं। उनका मानना है कि सार्वजनिक बदलाव की कोई भी कोशिश तभी कामयाब होगी जबकि वह […]