कमाल सुरेया की कविता (अनुवाद- यादवेन्द्र पाण्डेय)

कमाल सुरेया स्त्रियों की स्थिति इस पूरी दुनिया में लगभग एक जैसी है. उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हर देश काल परिस्थिति में होता आ रहा है. कमाल सुरेया की कविता को पढ़ कर कुछ ऐसा ही लगता है.  ‘एक दिन स्त्री चल देती है चुपचाप दबे पाँव’ कविता की आख़िरी पंक्तियाँ तो जैसे […]