उमाशंकर सिंह परमार की किताब ‘प्रतिरोध का वैश्विक स्थापत्य’ पर नासिर अहमद सिकन्दर की समीक्षा

उमा शंकर सिंह परमार युवा आलोचक उमा शंकर सिंह परमार की हाल ही में दो महत्वपूर्ण आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हुईं हैं. ये हैं – ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ और ‘प्रतिरोध का वैश्विक स्थापत्य’. इन पुस्तकों, विशेष तौर पर दूसरी पुस्तक को आधार बना कर कवि-आलोचक नासिर अहमद सिकन्दर ने एक समीक्षा लिखी है. इस समीक्षा को […]

अजय कुमार पाण्डेय के कविता संग्रह की उमाशंकर सिंह परमार द्वारा की गयी समीक्षा

अजय कुमार पाण्डेय कवि अजय कुमार पाण्डेय का एक कविता संग्रह “यही दुनियां है” पिछले वर्ष प्रकाशित हुआ। अजय पाण्डेय अधिकतर छोटी कविताएँ लिखते हैं। छोटी होने के बावजूद उनकी कविताएं अधिक मारक या कह लें प्रभावकारी होती हैं। इस संग्रह की जो और जितनी चर्चा होनी चाहिए थी वह नहीं हो पायी क्योंकि अजय […]

नासिर अहमद सिकन्दर के कविता संग्रह “अच्छा आदमी होता है अच्छा” पर उमाशंकर सिंह परमार की समीक्षा।

नासिर अहमद सिकन्दर नासिर अहमद सिकन्दर का एक कविता संग्रह पिछले वर्ष ही प्रकाशित हुआ है। “अच्छा आदमी होता है अच्छा” नाम के इस संग्रह में नासिर ने अपनी छोटी कविताओं के माध्यम से कविता में लय और छंद को साधने की सफल कोशिश की है। नासिर की इन कविताओं के गहरे अभिधार्थ भी हैं […]

सुधीर सक्सेना के संग्रह पर उमाशंकर सिंह परमार की समीक्षा “धूसर में बिलासपुर : गुमशुदा मूल्यों की तलाश।“

उमाशंकर सिंह परमार कवियों के लिए लम्बी कविता लिखना हमेशा चुनौती भरा होता है। न केवल विषय एवं कथ्य के स्तर पर बल्कि शिल्प और प्रवहमानता के स्तर पर भी। ‘गद्य’ में हाथ आजमाने की तरह ही लम्बी कविता लिखना भी कवि के लिए उसका निकष होता है। सुपरिचित कवि सुधीर सक्सेना ने अभी हाल […]

उमाशंकर सिंह परमार का आलेख ‘“बुझे चिराग जलाओ, बहुत अँधेरा है”

महेश चन्द्र पुनेठा युवा कवियों में महेश चन्द्र पुनेठा अपनी अलग तरह के कहन और व्यंजना के लिए जाने जाते हैं। वे कुछ उन दुर्लभ कवियों में से हैं जिनके व्यवहार और सिद्धान्त में आपको कोई फांक नहीं दिखायी पड़ेगी। उनकी कविताएँ पढ़ते हुए हम यह बराबर महसूस भी करते हैं। महेश की कविताओं पर […]

उमाशंकर सिंह परमार का आलेख “मैं मोम हूँ मुझे छूकर नहीं देखा”

कैलाश गौतम कैलाश गौतम का नाम आते ही उनकी वह बेलौस हँसी याद आती है जो पूरी तरह निश्छल हुआ करती थी। इस मामले में हम खुशनसीब हैं कि हमने गौतम जी की वह हँसी अपने आँखों देखी थी। निराला के शब्दों में कहें तो उनकी ‘वह हँसी बहुत कुछ कहती थी‘। कैलाश गौतम वस्तुतः […]

उमा शंकर सिंह परमार का आलेख “अँधेरे समय में उजली उम्मीदों का कवि”

वीरेन डंगवाल विगत 28 सितम्बर को हम सबके प्यारे कवि वीरेन डंगवाल नहीं रहे। पांच अगस्त 1947 को शुरू हुआ उनके जीवन का सफर 28 सितम्बर को सुबह 4 बजे समाप्त हो गया। वीरेन दा न केवल एक बेहतर कवि थे बल्कि एक उम्दा इंसान भी थे। उनसे मिलने वाला कोई भी व्यक्ति सहज ही […]

हरेप्रकाश उपाध्याय के उपन्यास ‘बखेड़ापुर’ पर उमाशंकर सिंह परमार की समीक्षा

हरेप्रकाश उपाध्याय एक सुपरिचित कवि हैं। ‘खिलाड़ी दोस्त और अन्य कविताएँ’ हरेप्रकाश का चर्चित संग्रह है। हाल ही में इनका एक नया उपन्यास प्रकाशित हुआ है – ‘बखेड़ापुर’।यह उपन्यास भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से पुरस्कृत हुआ है। युवा आलोचक उमाशंकर परमार ने इस उपन्यास की एक समीक्षा की है। आइए पढ़ते हैं यह समीक्षा।  […]

उमाशंकर सिंह परमार का आलेख ‘हिंदी भाषा का विकास और लोक की भूमिका’

  उमाशंकर सिंह परमार मनुष्य दुनिया का एक मात्र प्राणी है जिसने आपसी संवाद के लिए भाषा ईजाद किया है. यह भाषा भी एक-दो दिन में या अचानक ही नहीं बन गयी अपितु इसके बनने में एक लम्बा समय लगा. किसी भी भाषा के विकास में लोक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. धीरे-धीरे अभिजात वर्ग […]

उमाशंकर सिंह परमार का आलेख ‘लोक’ – स्वरूप और चेतना

‘लोक’ को ले कर सामान्य जनमानस में बहुत कुछ भ्रम की स्थिति बनी रहती है। ‘लोक’ के अर्थ और इसके विभिन्न पहलुओं पर युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार ने एक शोधपरक आलेख लिखा है। इस आलेख को हम पहली बार पर आप सबके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए पढ़ते हैं यह आलेख ‘लोक […]