आशीष मिश्र का हरीश चन्द्र पाण्डे पर आलेख ‘शब्द जहाँ भिगोये चने की तरह अँखुआ रहे हैं’

कविता लिखने के लिए जिस सूक्ष्म अन्वेषण दृष्टि की जरुरत होती है वह आजकल कम कवियों में दिखायी पड़ती है। इसीलिए आजकल की कविताओं में उस धार की प्रायः कमी दिखायी पड़ती है जिसकी अपेक्षा एक पाठक कविता को पढ़ते समय कवि से करता है। कविता कितनी परिश्रम की माँग करती है इसे एक बेहतर […]

आशीष मिश्र का आलेख ‘ये जो हमारा क्षयग्रस्त जीवन है’

मन्नू भण्डारी                 पाखी का मन्नू भण्डारी पर केन्द्रित अंक अभी-अभी प्रकाशित हुआ है। इस अंक में एक आलेख युवा आलोचक आशीष मिश्र का भी है। हम पहली बार के पाठकों के लिए इसे यहाँ पर प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए पढ़ते हैं आशीष मिश्र का यह आलेख ‘ये जो हमारा क्षयग्रस्त जीवन है।’  […]

सपना चमडिया की कविताएँ और सपना की कविताओं पर आशीष मिश्र का आलेख

सपना चमड़िया सपना चमडिया की कविताओं से गुजरना उन्हीं के शब्दों को उधार ले कर कहें तो ‘समाज और राजनीति के बड़े दायरे से हो कर गुजरना है।‘ बेशक ये कविताएँ पढ़ते हुए हम अपने समय के क्रूरतम यथार्थ से रू ब रू होते हैं। यह यथार्थ ‘रहमत खा’ कविता में दिखता है जिसमें सपना […]

केदार नाथ सिंह के संग्रह ‘सृष्टि पर पहरा’ की आशीष मिश्र द्वारा की गयी समीक्षा

केदार नाथ सिंह  केदार नाथ सिंह का हाल ही में एक नया कविता संग्रह आया है ‘सृष्टि पर पहरा’। इसमें केदार जी अपने पूरे काव्य-रौ में दिखाई पड़ते हैं। अपने आस-पास की चीजों को ले कर ही उसे एक मिथकीय रूप दे देना जैसे केदार जी के कवि को भाता रहा है। यह संग्रह पिछले […]

अष्टभुजा शुक्ल की कविता ‘चैत के बादल’ पर आशीष मिश्र की एक टिप्पणी

अष्टभुजा शुक्ल आसमान में उमड़ने घुमड़ने वाले बादल बचपन से ही हमारे मन में अनेकानेक कल्पनाओं को जन्म देते हैं। आकाश में अनेक रुपाकृतियाँ निर्मित करते ये बादल जैसे हमारे सामने एक विविध वर्णी रंग-मंच ही खड़ा कर देते हैं। यही बादल किसानों के मन को कभी हुलसित कर देते हैं तो कभी घोर चिन्ता-फ़िक्र […]

आशीष मिश्र का आलेख ‘गणेश पाइन : मृत्यु से दो-दो हाथ’

                      गणेश पाइन कला मानव मन की गहनतम अभिव्यक्ति है। कलाकार अपनी उस अभिव्यक्ति को पहले रेखाओं में ढालता है तत्पश्चात उसमें रंग भरता है। यहाँ पर हर एक रेखा, बिंदु या रंग का अपना ख़ास मतलब होता है। गणेश पाइन कोलकाता में जन्मे ऐसे ही कलाकार हैं जिनकी कला को मैलेंकोलिया नामक मनोरोग की […]

वाँन गॉग की पेंटिंग्स पर आशीष मिश्र का आलेख

(चित्र : वान गाग) तारपीन तेल में सूरज को घोला मैंने आशीष मिश्र   वान गाग के अन्य तमाम चित्रों के बजाय मुझे ‘गेहूँ के खेत’ श्रृंखला के चित्र ज़्यादा आकर्षित करते हैं। सम्भव है, इस इस आकर्षण के पीछे एक भारतीय किसान मन काम करता हो। वान ने इस श्रृंखला के अधिकांश चित्र अपने जीवन के […]