अच्युतानंद मिश्र का आलेख ‘शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है’

मुक्तिबोध आजाद भारत, जिसके सपने बुनते हमारे तमाम सेनानी अपनी आहुति दे बैठे, उनके लिए एक यूटोपिया ही साबित हुआ जिन्होंने उससे तमाम उम्मीदें पाल रखीं थीं.  शासकों के रंग-रूप तो जरुर बदल गए, लेकिन उनका चरित्र नहीं बदला. कुल मिला कर वह लोकतंत्र ही लहुलुहान होता रहा जिसे आजाद भारत का आधार बनाया गया […]

अरूण कमल के कविता कर्म पर अच्युतानन्द मिश्र का आलेख ‘यहाँ रोज कुछ बन रहा है।‘

अरुण कमल अरूण कमल हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि हैं। इनके सम्पूर्ण कविता कर्म पर हाल ही में एक आलेख लिखा है युवा कवि और आलोचक अच्युतानन्द मिश्र ने। तो आइए पढ़ते हैं अच्युतानन्द का आलेख ‘यहाँ रोज कुछ बन रहा है।‘        यहाँ रोज कुछ बन रहा है अच्युतानंद मिश्र आठवें दशक की […]

अच्युतानंद मिश्र का आलेख ‘ऐ काश जानता न तेरी रहगुजर को मैं’

लांग नाईन्टीज को ले कर हमने पहले भी इस ब्लॉग पर एक बहस चलायी थी जिसके अन्तर्गत विजेन्द्र जी, आग्नेय जी, अमीर चंद वैश्य, अशोक तिवारी और महेश चन्द्र पुनेठा के आलेख प्रकाशित हुए थे। इस बहस को ‘पहल’ ने भी आगे बढाया जिसमें मृत्युंजय, विवेक निराला और अच्युतानन्द मिश्र के लेख प्रकाशित हुए हैं। […]

रविशंकर उपाध्याय के लिए श्रद्धांजलिस्वरूप अच्युतानन्द मिश्र की दो कविताएँ

युवा कवि साथी रविशंकर हमारे बीच नहीं हैं, (हमारे लिए सबसे पहले हमारे अनुज.) ये मानने को आज भी मन नहीं कर रहा. ऐसा लग रहा है कि हमेशा की तरह रविशंकर की विनम्र आवाज मेरे मोबाईल पर सुनाई पड़ेगी. वह आवाज जो आज लगातार दुर्लभ होती जा रही है. लेकिन मानने-न मानने का नियति […]

यह कविता का नहीं कवियों का समय है

आजकल एक महत्त्वपूर्ण बात पर लगातार बात होती है कि कविता लगातार पाठकों से दूर क्यों होती जा रही है। क्या यह आज की कविता इस नाते पाठकों का वह सम्मान हासिल नहीं कर पा रही कि वह अपने को आज के समय से नहीं जोड़ पा रही। कई एक ऐसे ही महत्वपूर्ण सवालों पर […]

अच्युतानंद मिश्र

कवियों, दार्शनिकों और विचारकों के लिए मृत्यु हमेशा से एक ऐसा ‘रहस्य’ रही है जिस पर वे एक लम्बे अरसे से चिंतन करते आ रहे हैं. सभ्यता के सोपान पर आगे बढ़ते मनुष्य ने अपनी सुरक्षा के लिए या फिर किसी को चोट पहुंचाने के लिए जब पहला पत्थर उठाया होगा तब से ही शुरू […]