चैतन्य नागर का लेख ‘मौत के बाद का कारोबार’।

  चैतन्य इस सृष्टि में जहाँ भी जीवन है वहाँ मौत है। प्राचीन काल से ही मनुष्य अपने मृतकों की अंत्येष्टि के लिए तरह-तरह के तौर तरीके अपनाता रहा है। किसी को अपने सम्बन्धी के शव की अंत्येष्टि के लिए ‘दो गज जमीन’ चाहिए तो किसी को ‘पाँच मन लकड़ी।’ हिन्दू परम्परा में तो यह […]

श्यामबिहारी श्यामल के कहानी संग्रह ‘चना चबेना गंग जल’ पर नारायण सिंह की समीक्षा ‘मुक्ति की राह अकेले नहीं मिलती।’

श्यामबिहारी श्यामल श्यामबिहारी श्यामल एक सजग पत्रकार होने के अलावा एक बेहतर उपन्यासकार भी हैं। ‘धपेल’ और ‘अग्निपुरुष’ इनके चर्चित उपन्यास रहे हैं। कुछ वर्ष पहले महाकवि जयशंकर प्रसाद के जीवन पर आधारित उपन्यास ‘कंथा’ इन्होने पूरा किया है, जो ‘नवनीत’ में छप कर चर्चित हो चुका है। हाल ही में श्यामल का एक कहानी […]

भालचन्द्र जोशी की कहानी ‘पिशाच’

भाल चन्द्र जोशी भारत आज भी एक कृषि प्रधान देश है। देश की अर्थव्यवस्था आज भी बहुत हद तक खेती किसानी पर अवलम्बित है। लेकिन उदारवाद और पूँजीवाद ने किसानों को दिनोंदिन दिवालिया बनाने का ही काम किया है। समाज में आज भी सामंत और साहूकार हैं जो किसानों की लाचारी का फायदा उठाने से […]

सुशील कुमार का यह समालोचनात्मक आलेख ‘जनवाद का एक धूमिल युवा चेहरा’

अरविन्द श्रीवास्तव कवि सुशील कुमार ने इधर कई समालोचनात्मक आलेख लिख कर गद्य के क्षेत्र में भी ध्यान आकृष्ट किया है। अपने ही एक समकालीन कवि अरविन्द श्रीवास्तव की कविता पर सुशील कुमार का समालोचनात्मक लेख गद्य पर उनके पकड की बानगी प्रस्तुत करता है। अपने इस आलेख में सुशील कुमार ने आलोच्य कवि की खूबियों […]

नीलाभ का आलेख ‘अब्दुल करीम खां साहब और किराना घराना’।

नीलाभ अदम्य जिजीविषा के धनी नीलाभ का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे जितने अच्छे कवि थे उतने ही अच्छे आलोचक भी थे। नीलाभ द्वारा किये गए अनुवाद भी उत्कृष्ट कोटि के माने जाते हैं। हिन्दी, उर्दू, पंजाबी के साथ-साथ नीलाभ का अंग्रेजी और स्पेनिश पर भी अच्छा अधिकार था। अरुन्धती राय के चर्चित उपन्यास ‘गाड ऑफ़ […]

आशुतोष कुमार का आलेख ‘मुक्तिबोध की कविताएँ: ‘कि बेबीलोन सचमुच नष्ट होगा क्या?’

युवा आलोचक आशुतोष कुमार का एक महत्वपूर्ण आलेख आलोचना के मुक्तिबोध अंक में प्रकाशित हुआ है. यह आलेख मुक्तिबोध के रचना-कर्म को जानने-समझने के लिए एक जरुरी आलेख है. आशुतोष कुमार उन कुछ विरल आलोचकों में से हैं जो अत्यन्त कम लिखते हैं. फेसबुक पर सक्रियता के साथ-साथ प्राध्यापन कर्म और अन्य सामाजिक सक्रियताओं के […]

प्रज्ञा सिंह की कविताएँ

प्रज्ञा सिंह इस दुनिया की खूबसूरती को बचाए रखने का काम वाकई रचनाकारों ने ही किया है. उन्होंने वह सौन्दर्य-दृष्टि बचाए रखी है जिसमें ताकतवर विधायक के महलनुमा घर की बजाए झोपड़ियों को झिलमिल सितारे की तरह देखने का हुनर है. यह सौन्दर्य दृष्टि यूँ ही प्राप्त नहीं होती. कवयित्री प्रज्ञा सिंह ने इस दृष्टि […]

आशीष मिश्र का हरीश चन्द्र पाण्डे पर आलेख ‘शब्द जहाँ भिगोये चने की तरह अँखुआ रहे हैं’

कविता लिखने के लिए जिस सूक्ष्म अन्वेषण दृष्टि की जरुरत होती है वह आजकल कम कवियों में दिखायी पड़ती है। इसीलिए आजकल की कविताओं में उस धार की प्रायः कमी दिखायी पड़ती है जिसकी अपेक्षा एक पाठक कविता को पढ़ते समय कवि से करता है। कविता कितनी परिश्रम की माँग करती है इसे एक बेहतर […]

लाल बहादुर वर्मा का आलेख ‘प्रथम विश्व युद्ध जो खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।’

प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा इसमें कोई दो राय नहीं कि मनुष्य इस धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। यह सर्वश्रेष्ठता उसने अपने ज्ञान और कौशल के चलते हासिल की है। आज दुनिया की जो तस्वीर पूरी तरह बदल गयी है उसके पीछे मनुष्य के ज्ञान- विज्ञान की ही बड़ी भूमिका है। लेकिन तस्वीर का एक दूसरा […]

प्रतुल जोशी का आलेख ‘मृत्यु का अभिवादन’।

यह एक शाश्वत सत्य है कि हर जीवधारी की अन्तिम परिणति मृत्यु है। जीवन की शर्तों में मृत्यु अनिवार्य रूप से शामिल होती है। चुकि इसमें हमेशा हमेशा के लिए बिछड़ने का भाव होता है इसलिए यह दुखद होती है। लेकिन अब जब विज्ञान ने जीवन की अनेकानेक गुत्थियों को सुलझा दिया है कुछ तर्कवादी […]