स्वर एकादश पर स्वप्निल श्रीवास्तव की समीक्षा

बोधि प्रकाशन जयपुर से पिछले साल छपे ‘स्वर एकादश’ की एक समीक्षा लिखी है हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने। इसे हमने लखनऊ से निकलने वाली पत्रिका ‘अभिनव मीमांसा’ से साभार लिया है जिसके संपादक विवेक पाण्डेय हैं। विवेक के ही शब्दों में कहें तो ‘स्वर एकादश को समकालीन कविता का प्रतिनिधि संकलन […]

अखिलेश श्रीवास्तव चमन का आलेख ‘गिरफ़्त में बचपन’

  बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं। उन्हें बचपन में हम जैसा परिवेश देते हैं, भविष्य उसी के अनुसार निर्धारित होता है। न केवल बच्चे का बल्कि हमारे घर, परिवार, समाज और देश का भी। इसमें कोई दो राय नहीं कि आधुनिकता ने हमें ढेर सारी सुविधाएँ प्रदान की हैं लेकिन साथ ही […]

जयनन्दन की यह कहानी “लोकतंत्र की पैकिंग”

हमारे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों ने आजादी के बाद के भारत में जिस लोकतन्त्र का सपना देखा था उसमें प्रमुख रूप से यह भाव समाहित था कि सबको आर्थिक सुरक्षा मिले। सभी को जीने के लिए आधारभूत चीजें मुहैया हो। भारत की मिट्टी में पले-बढे कबीर ने भी कभी सोचा था ‘सांई इतना दीजिए, जामे कुटुम […]

युवा कवि और आलोचक शिरीष कुमार मौर्य से अनिल कार्की की बातचीत

लीक से अलग हट कर काम करने वाले युवा रचनाकारों में शिरीष कुमार मौर्य का नाम अग्रणी है. कविता और आलोचना के साथ-साथ शिरीष ने कला के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम किये हैं. शिरीष से उनके रचना कर्म पर बात की है युवा रंगकर्मी अनिल कार्की ने. तो आईए पढ़ते हैं यह साक्षात्कार     युवा […]

आशीष नैथानी की कविताएँ

ज़माना चाहें जहाँ  जाए मनुष्यता कायम रहेगी। तभी तो इरोम शर्मिला लगभग चौदह वर्षों से अपने राज्य में ‘ए एफ एस पी ए’ क़ानून के खिलाफ भूख हड़ताल कर रही कर रही हैं और हैदराबाद के  युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर आशीष नैथानी इरोम के समर्थन में कविताएँ लिख रहे हैं. स्त्रियों के खिलाफ हिंसा खासतौर पर […]

सरिता शर्मा का उड़ीसा यात्रा वृत्तान्त ‘मुखर पत्थरों और गूँजते मंदिरों में भटकता मन’

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल जिंदगानी फिर कहाँ, जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहाँ। राहुल सांकृत्यायन की ये पंक्तियाँ मेरे मन में आज भी तब गूँज उठतीं हैं जब मैं किसी यात्रा वृत्तांत से हो कर गुजरता हूँ। सरिता शर्मा ने अपनी उड़ीसा यात्रा का एक रोचक विवरण कुछ फोटोग्राफ्स के साथ लिख भेजा […]

रामजी तिवारी की टिप्पणी ‘पुरुषोत्तम अग्रवाल’ की कहानियाँ पढ़ते हुए …….’

पुरुषोत्तम अग्रवाल एक सुधी आलोचक मौलिक रूप से खुद भी एक लेखक होता है। आलोचना में वह रचना के बरक्स एक कृति का ही सृजन करता है। यह परंपरा हमारे यहाँ काफी समृद्ध रही है। पुरुषोत्तम अग्रवाल का नाम इसी कडी में एक प्रमुख नाम है। अपनी आलोचना से पाठकों का दिल जीतने वाले पुरुषोत्तम […]

डॉ0 रोहिणी अग्रवाल का आलेख ‘चुप्पी में पगे शुभाशीष बनाम पचास साल का अंतराल और प्रेम को रौंदती आक्रामकता’

शेखर जोशी शेखर जोशी के जन्मदिन पर पिछले दिनों आपने उनकी उम्दा कहानी मेंटल पढ़ी। आज हम शेखर जी की कहानियों पर वरिष्ठ आलोचक रोहिणी अग्रवाल का आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं। रोहिणी अग्रवाल ने अपने  इस आलेख में शेखर जी की चर्चित कहानी ‘कोसी का घटवार’ का एक तुलनात्मक अध्यययन किया है। इस आलेख […]

शेखर जोशी की कहानी ‘मेंटल’

कारखाने के मजदूरों को ले कर हिन्दी में गिने-चुने कहानीकारों ने ही कहानियाँ लिखीं हैं। शेखर जोशी का नाम ऐसे कहानीकारों में अग्रणी है जिन्होंने कारखाने के जीवन को ले कर कई बढियाँ कहानियां लिखीं हैं। ‘मेन्टल’ ऐसी ही एक कहानी है जिसमें एक मजदूर अपने स्वाभिमान के लिए मेन्टल कहलाये जाने की हद तक  […]

केशव तिवारी के संग्रह ‘तो काहे का मैं’ उमाशंकर सिंह परमार की समीक्षा

हिन्दी कविता में केशव तिवारी अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं। केशव न केवल अपनी अपनी भाषा और शिल्प के तौर पर बल्कि अपने कहन के तौर पर भी औरों से अलग से नजर आते हैं। हाल ही में उनका तीसरा संग्रह ‘तो काहे का मैं’ इलाहाबाद के साहित्य भण्डार प्रकाशन से छप कर […]