कवि का गाँव : राहुल देव

हमने हाल ही में एक कॉलम शुरू किया था : “कवि का गाँव”. पिछले महीने मैं जब लखनऊ गया था तो वहाँ युवा कवि राहुल देव अपने नवप्रकाशित कविता संग्रह के साथ मिले। राहुल देव ने कवि का गाँव कॉलम के लिए अपने गाँव की कुछ तस्वीरें और गाँव के बारे में एक छोटी सी […]

शिरीष कुमार मौर्य की 15 नई कविताएं

साहित्य की जो सबसे बड़ी खूबी है वह यही है कि वह हर समय में शोषण और अत्याचार के खिलाफ खड़ा रहता है. सत्ता जो एक मद जैसा होता है, उसको उसकी सीमा का अहसास यह साहित्य ही कराता है. यह इसलिए भी काबिलेगौर है कि अभी-अभी हुए आम चुनावों में मीडिया (जिसे अब तक […]

रविशंकर उपाध्याय के लिए श्रद्धांजलिस्वरूप अच्युतानन्द मिश्र की दो कविताएँ

युवा कवि साथी रविशंकर हमारे बीच नहीं हैं, (हमारे लिए सबसे पहले हमारे अनुज.) ये मानने को आज भी मन नहीं कर रहा. ऐसा लग रहा है कि हमेशा की तरह रविशंकर की विनम्र आवाज मेरे मोबाईल पर सुनाई पड़ेगी. वह आवाज जो आज लगातार दुर्लभ होती जा रही है. लेकिन मानने-न मानने का नियति […]

विमल चन्द्र पाण्डेय के उपन्यास ‘भले दिनों की बात थी’ पर सरिता शर्मा की समीक्षा

विमल चन्द्र पाण्डेय हमारे समय के कुछ उन चुनिन्दा रचनाकारों में से एक हैं जिन्होंने कहानी, कविता, संस्मरण जैसी विधाओं में अपना लोहा मनवाया है. अब आधार प्रकाशन से हाल ही में  उनका एक उपन्यास ‘आवारा सपनों के दिन’ प्रकाशित हुआ है. सरिता शर्मा ने इस उपन्यास पर पहली बार के लिए एक समीक्षा लिखी […]

‘प्लाजमा’ कविता पर अमीरचंद वैश्य का आलेख

   विजेन्द्र जी की लोक के प्रति प्रतिबद्धता से हम सब वाकिफ हैं. इसी क्रम में उन्होंने कई लम्बी कविताएँ भी लिखी हैं जिनमें प्लाजमा उल्लेखनीय है. इस लम्बी कविता की पड़ताल की है अमीर चन्द्र वैश्य ने. तो आईये पढ़ते हैं अमीर जी का यह आलेख ‘समर जारी है बदस्तूर’   समर जारी है […]

श्रीराम त्रिपाठी का आलेख ‘कृषक-कृषक का गुणन’

आलोचना एक दुष्कर कर्म है. आम तौर पर लोग आलोचना का मतलब उखाड़-पछाड़ या रचना की पंक्तिबद्ध व्याख्या से लगा लेते हैं जबकि इन सबसे इतर आलोचना रचना के ही समानान्तर उस का एक पुनर्पाठ करती है. रचना के समानान्तर खड़ी हो कर उससे बोलती-बतियाती है और  उसे फिर से अपने तईं पुनर्रचित करती है. […]

शैक्षिक दखल पर चिन्तामणि जोशी की टिप्पणी

शिक्षा किसी भी समाज के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाती है. दुर्भाग्यवश हमारी शिक्षा व्यवस्था न केवल राजनीतिज्ञों द्वारा बल्कि हमारे समय के बुद्धिजीवियों द्वारा भी नजरअंदाज की जाती रही है. इसका महत्व इसी से समझा जा सकता है कि स्वतंत्रता संग्राम के समय हमारे सेनानियों और साहित्यकारों के पास शिक्षा को ले कर एक […]

हितेन्द्र पटेल के उपन्यास ‘चिरकुट’ पर रमाशंकर की समीक्षा

किसी भी रचनाकार के लिए इतिहास बोध का होना जरुरी होता है। और जब यह लेखन खुद एक इतिहासकार द्वारा किया जाय तो उसमें इतिहास-बोध स्वाभाविक रूप से आता है। हरबंस मुखिया, लाल बहादुर वर्मा और बद्रीनारायण के साथ-साथ हितेन्द्र पटेल भी एक ऐसा ही सुपरिचित नाम है जो इतिहास के साथ-साथ साहित्य में भी […]

दिनकर कुमार की कविताएँ

एकबारगी सब कुछ बदल गया है अपने यहाँ. रियल स्टेट का आतंक. आवारा पूँजी की रक्तरंजित अभिलाषा. धन पिशाचों की अनन्त महत्वाकांक्षाएँ अपने इर्द-गिर्द इस तरह मंडरा रही हैं जिससे यह झूठा लगने लगा है कि भारत गाँवों का देश है. राजनीति अब सेवा नहीं लूट-खसोट का जरिया बन गयी है. लोकतन्त्र जिस पर हम […]

गायत्री प्रियदर्शिनी की कविताएँ

चाँद हमेशा से कवियों के लिए आकर्षण का एक केन्द्र रहा है. नया से नया कवि भी इस चाँद पर अपनी कलम जरुर चलाता है. इसी चाँद और चाँदनी को ले कर गायत्री प्रियदर्शनी ने कुछ कविताएँ  लिखी हैं जो हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. गायत्री की कविताएँ आप पहले भी इस ब्लॉग […]