साझा संस्कृति संगम में स्वीकृत इलाहाबाद घोषणा

इलाहाबाद में विगत 14-15 फरवरी 2014 को ‘साझा सांस्कृतिक संगम’ का आयोजन हुआ. ‘जनवादी लेखक संघ’ के इस आयोजन में स्थानीय स्तर पर ‘जन संस्कृति मंच’ और ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ भी भागीदार थे. इस संगम में देश भर से लगभग 250 लेखक शामिल हुए. कार्यक्रम के दूसरे दिन 15 फरवरी को ‘जनवादी लेखक संघ’ के […]

स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताएँ

आज का समय कुछ लोगों के लिए बहुत हड़बड़ी का समय है. वे एक क्षण में सब कुछ पा जाना चाहते हैं. उनके शब्दकोष में जैसे ‘धैर्य’ शब्द ही नदारद है. आखिर वे कौन लोग हैं. ऐसे लोग सर्वहारा वर्ग के नहीं हैं. सर्वहारा तो आज भी अपने उन दिनों की प्रतीक्षा में असीम धैर्य […]

एकान्त श्रीवास्तव के उपन्यास ‘पानी भीतर फूल.’ पर जीतेन्द्र कुमार की समीक्षा

एकान्त श्रीवास्तव मूलतः कवि हैं. अभी हाल ही में उनका एक नया उपन्यास आया है ‘पानी भीतर फूल.’ इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में छतीसगढ़ का ग्रामीण जीवन है जिसके साक्षी एकान्त खुद हैं. वे मूलतः उसी अंचल के रहने वाले हैं इसीलिए वहाँ के जीवन, प्रकृति और समस्याओं से भलीभांति अवगत हैं. एकान्त की अपने […]

प्रभात पटनायक का आलेख ‘नवउदारवाद और सांप्रदायिक फ़ासीवाद का उभार’

‘देखन में छोटन लगें घाव करें गम्भीर’ यह उक्ति आज की उस उदारवादी व्यवस्था पर शत-प्रतिशत लागू होती है जो दरअसल हमारे जीवन को दिन-प्रतिदिन दुश्वार बनाती जा रही है. लोकतन्त्र जब भी जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता तब इसका अंजाम अन्ततः लोकतन्त्र की विफलता होता है जो लोगों को फासीवाद की तरफ […]

अमरकान्त जी से धनञ्जय चोपड़ा की एक बातचीत

अमरकान्त : …..वे जो  हमेशा अपने समय का सच रचते रहे  17 फरवरी 2014 को प्रख्यात कथाकार अमरकान्त जी नहीं रहे. यह हम सबके लिए एक बड़ा आघात है. उनके न रहने से हम इलाहाबादवासियों ने अपना अभिभावक खो दिया. एक ऐसा अभिभावक जो महान होते हुए भी इतना सरल और सहज था कि उससे […]

अमरकान्त ; कुछ यादें और कुछ बातें

प्रख्यात कहानीकार अमरकान्त जी का आज 17 फरवरी 2014 को प्रातः 9.45 पर निधन हो गया. वे वर्ष 1989 से आस्टियोपोरोसिस नामक रोग से पीड़ित थे. इसके बावजूद अंतिम समय तक लगातार रचनाशील रहे.  अमरकान्त जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में नगरा कसबे के पास स्थित भगमलपुर नामक गाँव में 01 जुलाई […]

ज्योति चावला की कहानी ‘सुधा बस सुन रही थी’

ज्योति चावला का नया कहानी संग्रह ‘अँधेरे की कोई शक्ल नहीं होती’ आधार प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. ज्योति अपनी कहानियों के माध्यम से अपने समय और समाज के सच को बेबाकी से उद्घाटित करती हैं. कहानी कहने का ढंग भी कुछ इसी तरह का कि पाठक लगातार उसमें डूबता चला जाता है. यही नहीं […]

रवि नन्दन सिंह की कविताएँ

कवि इसी मायने में औरों से अलग होता है कि वह वस्तुस्थिति का आंकलन वस्तुनिष्ठ ढंग से करने का प्रयास करता है. इसीलिए वह प्रायः बनी बनायी मान्यताओं से सहमत नहीं हो पाता और उसका स्वर विद्रोही प्रकृति का लगता है. लोकतन्त्र भी हमारे भारत के लिए ऐसी ही मरीचिका साबित हुआ है जिसमें आम व्यक्ति […]

‘व्योमकेश दरवेश’ पर अरुणाकर पाण्डेय की समीक्षा ‘हमन को होसियारी क्या!’

हमारे समय के अनूठे और बेजोड़ लेखक-आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी को व्योमकेश दरवेश के लिए ‘व्यास सम्मान’ प्रदान किया गया है. आदरणीय विश्वनाथ जी को बधाई देते हुए हम प्रस्तुत कर रहे हैं इस किताब की एक समीक्षा, जिसे हमारे अनुरोध पर लिखा है मित्र कवि अरुणाकर पाण्डेय ने.   एक लेखक की ताकत का  इससे अंदाजा […]

एस.आर.हरनोट की कहानी ‘आभी’

अपने आस पास के घटनाओं और परिस्थितियों को तो कहानीकार अपनी कहानियों का विषय बनाते ही हैं लेकिन आज के समय में यह बहुत कम देखने में आता है कि कोई कहानीकार किसी  चिड़िया या कोई पशु को केन्द्रित कर कोई कहानी लिखे। एस आर हरनोट इन्हीं अर्थों में अलग कहानीकार हैं जिन्होंने यह जोखिम […]