शिरोमणि महतो के कविता संग्रह ‘भात का भूगोल’ की समीक्षा:जेब अख्तर

  युवा कवि शिरोमणि महतो का कविता संग्रह ‘भात का भूगोल’ अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की एक समीक्षा लिखी है जेब अख्तर ने। लीजिए प्रस्तुत है यह समीक्षा।    आम आदमी की भाषा में आम आदमी की कविताएं जेब अख्तर भात का भूगोल शिरोमणि महतो का तीसरा कविता संग्रह है। इसके […]

लेखक की गरिमा और पुरस्कार की प्रतिष्ठा का प्रश्न

(संदर्भ: लमही सम्मान) भालचन्द्र जोशीअभी हाल ही में लमही सम्मान को ले कर साहित्य जगत में काफी बावेला खड़ा हुआ था। फेसबुक पर इसको ले कर तमाम बातें और बहसें हुईं। कुछ समय बाद यद्यपि यह बावेला ठंडा पड़ गया लेकिन इस मसले ने लेखकीय गरिमा जैसे महत्वपूर्ण सवाल को हमारे सामने उठा दिया। इस पूरे […]

रमाकान्त राय

आज पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली साहित्यिक प्रतिक्रियाओं को भले ही हल्के में लिया जाता हो लेकिन इसका एक आशय हुआ करता है. समीक्षा कैसे की जाती है और रचनाओं पर कैसे बेलाग प्रतिक्रिया व्यक्त की जानी चाहिए इसके बारे में हम मार्कंडेय की इसी तरह की उन टिप्पणियों को पढ़ कर जाना सकते हैं, जिसे […]

चन्द्रकान्त देवताले से मनोज पाण्डेय की बातचीत

चन्द्रकान्त देवताले ऐसे कवि हैं जिनका व्यक्तित्व निर्विवाद है। वे ठेठ कवि ही हैं। खुद भी वे अपने को पूरावक्ती कवि मानते हैं। एक ऐसा कवि जो पूरी निर्भीकता से उनके साथ खड़ा है जिनके साथ कोई खड़ा नहीं। आज जब स्त्रियों के प्रति हमारा समाज असहिष्णु और हिंसक दिखाई पड़ रहा है वैसे में […]

जीतेन्द्र कुमार की कहानी ‘जकड़न’

जातिवादी जकडन से घिरे प्यारे लाल चौबे खेती कराने का जब उपक्रम करते हैं तो उनके सामने एक-एक कर तमाम समस्याएं आती हैं। इस कहानी के माध्यम से जीतेन्द्र कुमार न केवल जातिवादी जकड़न बल्कि कृषिगत जकड़नों की भी बात करते हैं। आधुनिकता की मार झेल रहा किसान किन द्वंदों से गुजर रहा है इसकी […]

कठफूला बाँस: करुणा और प्रतिरोध का सौन्दर्य

विजेन्द्र जी की लम्बी एक कविता है ‘कठफूला बाँस।’ यह कविता श्रीराम तिवारी की पत्रिका ‘पक्ष’ में १९७७ ई में छपी थी। अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण इस कविता की तरफ आलोचकों का लम्बे अरसे तक ध्यान नहीं गया। तिवारी जी ने अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में लिखा था – ‘इस कविता से एक मुकम्मिल रचनात्मक स्थिति […]

महकती रहेगी ‘बातां री फुलवारी’

विजय दान देथा का पिछले दिनों 10 नवम्बर 2013 को निधन हो गया। देथा जिन्हें हम प्यार से ‘विज्जी’ कहते थे पर एक श्रद्धांजलि आलेख भेजा है हमारे मित्र मूलतः बीकानेर के मनमोहन लटियाल ने। प्रस्तुत है यह आलेख।  मृत्यु एक शाश्वत सत्य है और उससे किसी न किसी दिन हम सबको रूबरू होना ही […]

जंगल की गुहार: धपेल

वाड्.मय : जुलाई 2013 के आदिवासी विशेषांक- 1 में श्याम बिहारी श्यामल के राजकमल प्रकाशन से वर्ष 1998 में छपे महत्वपूर्ण उपन्यास धपेल पर डा. दया दीक्षित का एक आलेख प्रकाशित हुआ है। आईये पढ़ते हैं यह आलेख ‘जंगल की गुहार : धपेल’ दया दीक्षित     श्याम बिहारी श्यामल का उपन्यास ‘धपेल’ पढ़ने के बाद […]

ओमप्रकाश वाल्मीकि

ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर जिले के बरला में 30 जून 1950 को एक सामान्य दलित परिवार में हुआ। वाल्मीकि जी ने साहित्य के क्षेत्र में कविता, कहानी, आलोचना के क्षेत्र में काम किया। उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ आज एक महत्वपूर्ण आत्मकथा मानी जाती है।        उनकी कुछ प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं […]

अरुणाकर पाण्डेय की कविताएँ

  जन्म : तीन नवम्बर उन्नीस सौ उन्यासी, बनारस शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से “हिन्दी की साप्ताहिक पत्रिकाओं में सांस्कृतिक-विमर्श (१९९० के बाद )” विषय पर पीएच.डी.           तथा वहीँ से “हिन्दी की कार्टून पत्रकारिता के राजनीतिक-सामाजिक सरोकार” विषय पर एम्.फिल. प्रकाशित रचनाएँ : ‘वाक्’,’अनभै-साँचा’,’अपेक्षा’,’युद्धरत आम आदमी’ तथा अन्य पत्रिकाओं में रचनाएँ-आलेख प्रकाशित                          तथा अन्य पत्रिकाओं और पुस्तकों […]