मार्कण्डेय

किसी भी रचनाकार के लिए अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बात करना बहुत आसान नहीं होता. समय का एक-एक रेशा चुपके से किसी भी लेखक के लेखकीय व्यक्तित्व की निर्मित्ति में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता चला जाता है. और इसी धरातल पर वह वितान निर्मित होता है जिसे हम रचनाकार के नाम से जानते […]

भरत प्रसाद

भरत प्रसाद ने आलोचना के साथ-साथ कविताएँ और कुछ कहानियां भी लिखीं हैं. ‘का गुरू’ भरत की एक नवीनतम व्यंग्परक कहानी है जिसमें उन्होंने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त दुराचारों को अपनी कहानी का विषय बनाया है. भरत खुद भी पूर्वोत्तर विश्वविद्यालय शिलांग में हिन्दी के एक प्रोफ़ेसर हैं और वे इस बुद्धिजीवी समुदाय […]

विपिन चौधरी

आज का हमारा यह दौर रचनात्मक रूप से इतना उर्वर दौर है जितना पहले शायद कभी नहीं रहा. विपिन चौधरी युवा कविता और कहानी के क्षेत्र में एक ऐसा ही नाम है जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता से गहरे तौर पर प्रभावित किया है. यह विपिन जी के कवि मन की सामर्थ्य ही है कि आज जब […]

केशव तिवारी

लोक धर्मी कविताओं की जब भी बात आती है केशव तिवारी का नाम जरूरी तौर पर लिया जाता है. केदार नाथ अग्रवाल की जमीन बांदा में रहते हुए केशव ने कविता की जो जोत जला रखी है उसका प्रकाश अब दूर दराज तलक दिखाई पडने लगा है. केशव के अब तक दो कविता संग्रह ‘इस […]

विमल चन्द्र पाण्डेय

कुछ नए कहानीकारों जिन्होंने इधर कहानी को फिर से साहित्य की मुख्य विधा के रूप में स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है, उसमें विमल चंद्र पाण्डेय का नाम अग्रणी है. इनके कहानी संग्रह ‘डर’ को ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार मिल चुका है. जीवन के सरोकारों से जुडी हुई विमल की कहानियाँ पढते हुए बराबर […]

रामजी तिवारी

रामजी तिवारी ने १९९७ में कुछ गीत लिखे थे. यह एक तरह से इनके रचनात्मक जीवन की शुरुआत थी. लेकिन बलिया जैसी जगह पर साहित्यिक माहौल न मिलने की वजह से लेखन का यह सफर थम सा गया. एक लंबे अंतराल के पश्चात २००९ से रामजी भाई ने लेखन की फिर से शुरुआत की. इस […]

वन्दना शुक्ला

स्त्री मुक्ति के संग्राम स्त्री स्वातंत्र्य क्या है?  क्यूँ इसकी आवश्यकता है?  निस्संदेह आज़ादी की चाहत या मांग उसी की होती है जो परतंत्र होता है, इसका सीधा अर्थ है कि नारी परतंत्र है इसलिए उसके स्वातंत्र्य की चेष्टाएं,  उसकी कामना की जाती है दिवस मनाया जाता है (पुरुष स्वतंत्र है इसलिए उसे दिवस की […]

अरुण माहेश्वरी

(चित्रः गूगल के सौजन्य से) अज्ञेय शताब्दी समारोहों के बहाने सात मार्च 1911 को जन्मे अज्ञेय जी का शताब्दी वर्ष पूरा हो गया। हिंदी जगत में उनके लिये श्रद्धा-सुमनों की कोई कमी नहीं रही। अलग-अलग शहरों में कई आयोजन हुए। अखबारों, पत्रिकाओं में कुछ छोटी-मोटी टिप्पणियां आयीं। उनके निकट के मित्रों, संबंधियों ने एक-दो किताबें […]