चार्वी सिंह

चार्वी सिंह २१ वीं सदी की गंगा का दर्द……..!!!!! सदियों से लोगों के पापों को धोती,गंगोत्री से लेकर गंगासागर की गहराई तक,हर कुम्भ महाकुम्भ की मूक गवाह,हर मोड़ और ढलान पर छली गई,आज तक इंतज़ार करती रही…..कोई तो आए…………. दो बूंद सच्चाई की अपनी अखियों में भर , कोई तो आए………..बहुत आसान है……………हर पाप करने […]

शेखर जोशी

हमारे पसंदीदा कहानीकार शेखर जोशी ‘कोसी का घटवार’, ‘दाज्यू, ‘बदबू’ जैसी कालजयी कहानियों के लिए जाने जाते हैं। इधर पिछले दिनों शेखर दा बीमार पड़े। पता चला मस्तिस्क में दो जगह ब्रेन हैमेरेज है। आपरेशन के सिलसिले में अस्पताल में रहे। जैसा कि शेखर दा ने बताया कि अस्पताल मे उनके बगल में अवध के […]

अजय कुमार पांडेय

बच्चे के दांत   यह जो बच्चा सामने बैठा है मुँह बाये हॅंस रहा है, इसके दो दॉंत  ऊपर,दो दॉंत नीचे उगे हैं –फर्श से उठ कर खड़े  होने की कोशिश मेंहर बार गिरा जा रहा है। कल मैंने इसे खड़ा करने के लिए उॅंगली पकड़ाई इसने पकड़ कर काट लिया मैंने इसके मुँह से झट […]

रामजी तिवारी

बुखार हरीश बाबू की पहचान धुनों के पक्के आदमी की थी । अपने मित्रों के बीच वे इसी नाम से जानें जाते। हाँलाकि हरीश बाबू इन विशेषणों को बहुत महत्व नहीं देते और बड़ी सादगी से कहते – ‘‘ईश्वर ने हमें आदमी बनाया है और हमें वही रहना है न उससे अधिक और न उससे […]

राजेश जोशी

नाम में क्या धरा है चेहरे याद रहते हैं और आजकल लोगों के नाम मैं अक्सर भूल जाता हूँ वह जो कुछ देर पहले ही मिला बहुत तपाक से और बातें करता रहा देर तक पच जाता है दिमाग पर उसका नाम याद नहीं आता मन ही मन अपने को समझाता हूँ कि इसमें कुछ […]

कैलाश झा किंकर

कैलाश झा किंकर की ग़ज़लें परिचय कैलाश किंकर का जन्म बिहार के खगड़िया जिले में १२ जनवरी १९६२ ई को हुआ. शिक्षा एम ए, एल एल. बी. प्रकाशित कृतियाँ- ‘सन्देश’, ‘दरकती जमीन’, ‘चलो पाठशाला’ (सभी कविता संग्रह), ‘कोई कोई औरत’ (खंड काव्य) ‘हम नदी के धार में’, ‘देख कर हैरान हैं सब’, ‘जिंदगी के रंग […]

विस्लावा शिम्बोर्स्का

विस्लावा  शिम्बोर्स्का   (चित्र- विस्लावा सिम्बोर्सका, गूगल से साभार )  मृत्य पर , बिना अतिशयोक्ति ————————– झेल नहीं सकती एक कहकहाढूंढ नहीं सकती कोई तारा बुनाई , खनाई , खेती काइसे कुछ पता नहीं जहाज बनाने या केक पकाने का तो सवाल ही नहीं लेकिन कहना न होगा कि कल की हमारी सारी तैयारियों पर आख़िरी […]

प्रज्ञा पाण्डेय

प्रज्ञा पाण्डेय स्त्री की देह भी अपनी नहीं आज के समय में या आज से पहले देह से बाहर स्त्री का कोई अस्तित्व न था और न है ! हाँ ! पत्थर युग में था! स्त्री तब अपने आदिम गुणों के साथ मौजूद थी. आज की सामाजिक जटिलताओं में हर जगह स्त्री देह के रूप […]