भरत प्रसाद

भरत प्रसाद का जन्म उत्तर प्रदेश के संत कबीरनगर जिले के हरपुर नामक गाँव में २५ जनवरी १९७० को हुआ. इन्होने १९९४ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी ए किया. फिर जे एन यू से हिंदी साहित्य में एम ए किया. जे एन यू से ही ‘भूरी भूरी खाक धूल (काव्य संग्रह) में मुक्तिबोध की युग […]

हरीश चन्द्र पांडे

हरीश चन्द्र पाण्डे अनुभव और पक्षधरता समकालीन  कविता  में ऐसे  रचनाकारों  की अच्छी तादाद है जिनकी कविताये बोलती हैं कि उनकी जड़ें गाँवो में है या फिर शहर में रहते हुए भी गाँव उन्हें बुलाता रहता है. निपट स्मृतियों के गाँव नास्टेलजिक  हो सकते हैं. पर गाँव से सतत जुड़ाव रखने वाले रचनाकार के लेखन में विकास और विकृतियों की अद्यतनता दिखाई देती है. ऐसे रचनाकार की रचनाएं लेखक की सहयात्रा या सहद्रष्टा होती है और इसीलिए विश्वसनीय भी. संतोष कुमार चतुर्वेदी एक ऐसे ही रचनाकार है. कहा जा […]

नीलाभ

नीलाभ का जन्म १६ अगस्त १९४५ को मुम्बई में हुआ. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम ए. पढाई के दौरान ही लेखन की शुरूआत. आजीविका के लिए आरंभ में प्रकाशन. फिर ४ वर्ष तक बी बी सी की विदेश प्रसारण सेवा में प्रोड्यूसर. १९८४ में भारत वापसी के बाद लेखन पर निर्भर. ‘संस्मरणारंभ’, ‘अपने आप से लम्बी बातचीत’, […]

ज्योति चावला

ज्योति  चावला ज्योति चावला का जन्म ५ अक्टूबर १९७९ को दिल्ली में हुआ. नया ज्ञानोदय, आलोचना, वागर्थ, प्रगतिशील वसुधा, परिकथा, पाखी आदि पत्र पत्रिकाओं में कवितायेँ एवं कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं. ज्योति ने ‘पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस’ से प्रकाशित ‘श्रेष्ठ हिंदी कहानियां’ (१९९०-2000) का संपादन भी किया है. इनका पहला कविता संकलन शीघ्र ही आने वाला है. […]

ध्रुव हर्ष

ध्रुव हर्ष का जन्म उत्तर प्रदेश के गोंडा  जिले  के मनकापुर के बनकसिया  नामक गाँव में १५ जनवरी 1989 को हुआ.  इलाहाबाद  विश्वविद्यालय से अंग्रेजी से परास्नातक करने के बाद अभी- अभी शोध के लिए हुई संयुक्त प्रवेश   परीक्षा पास की है. ध्रुव हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी में भी कविताये लिखते हैं. इनकी कविताओं में उस प्रेम का आभास दिखाई पडता  है जिसकी तरफ युवा मन सहज ही आकृष्ट होता  है लेकिन वह हकीकतों से भी अंजान नहीं है कि उसके प्रेम को ये समाज सहज स्वीकृति देने वाला नहीं है. फिर भी उसके […]

रामजी तिवारी

बलिया फिल्म समारोह (फिल्म समारोह  के समय  खचाखच भरा हुआ बलिया का बापू भवन) प्रतिरोध का सिनेमा और पहला बलिया फिल्म समारोह जन संस्कृति मंच , गोरखपुर फिल्म सोसाइटी “एक्सप्रेशन ” और बलिया की सांस्कृतिक संस्था”संकल्प “के संयुक्त तत्वावधान में दो दिनों तक चलने वाले “पहले बलिया फिल्म उत्सव -२०११’ का कल समापन हो गया.“प्रतिरोध का सिनेमा”नामक थीम […]

संजीव कुमार

वरिष्‍ठ कथाकार शेखर जोशी के जन्‍मदिन (10 सितम्‍बर) पर उनके रचनाकर्म पर युवा आलोचक संजीव कुमार का आलेख- संजीव कुमार शेखर जोशी : दबे पाँव चलती कहानियाँ बीती सदी का छठा दशक हिन्‍दी कहानी के अत्यंत ऊर्वर दौर के रूप में आज भी याद किया जाता है। अगर हिन्‍दी के दो दर्जन प्रतिनिधि कहानीकारों की […]

‘पाश’

अवतार सिंह ‘पाश’  (गूगल के सौजन्य से)  मैं अब विदा लेता हूँ मैं अब विदा लेता हूँ , मेरी दोस्त ,मैं अब    विदा लेता हूँ मैने एक कविता लिखनी चाही थी , सारी उम्र जिसे तुम पढती रह सकती ,प्यार करना … और लड़ सकना जीने पे ईमान ले आना मेरी दोस्त यही होता है ,धूप की तरह […]

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर शिक्षा का गिरता स्तर कौन हैं जिम्मेदार पंद्रह अगस्त 1947 को भारत को मिली आजादी में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मानना था कि, वास्तविक शिक्षा वह है जिससे व्यक्ति के चरित्र का निर्माण हो। किन्तु, आजादी के 31 साल बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को यह […]

बलभद्र

अंटका  में पड़ल वसंत गाँव के गाँव  सरसों  के पियर-पियर फूलन से घेरा गईल बा. हरियर हरियर के  ऊपर -ऊपर पियर-पियर. एह दूनो  रंग के ई आपसी   संजोग दूसर कौनो मौसम में  ना मिली. ई हरियर आ पियर   ऊपर से नइखे टपकल, बलुक धरती के भीतर  से  निकलल बा. अपने आप नाहीं.  कुछे दिन पहिले  त धेला धमानी  रहे . एक रंग माटी के रंग. आ आज अनेक रंग, आ अनेक के ऊपर सरसों के रंगीनी. माटी  में आदमी आपन परान बो के साकार करेला अइसन रंग. कवनो खेत में  गेहूँ, कवनो में  जौव  , कवनो में तीसी, बूंट, मटर, कवनो-कवनो में. आ सब में  सरसों टपका-टपका. कवनो-कवनो में खाली सरसों. तब जा के पसरल बा सगरो  सउसे बधार में अइसन रंगीनी. कवनो  रंगरेज धरती के चुनरी रंग देले बा एह  रंग में. गावन के  घेर- घुरवेट देले […]